मैं इसे किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक मानवीय विचार के रूप में देखती हूँ।
पिछले कुछ समय से देश में अनेक घटनाओं के दौरान हमने देखा है कि अलग-अलग जातियों, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं के लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हुए, एक-दूसरे की मदद की, अपनी आवाज़ मिलाई और कठिन समय में सहयोग दिया।
क्या यह भी "इश्क" का ही एक रूप नहीं है?
यदि इश्क का अर्थ केवल व्यक्तिगत प्रेम न होकर मानवता, संवेदना, सहयोग, सम्मान और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होना है, तो शायद हम सब किसी न किसी रूप में इस "इश्क" को जीते ही हैं।
यह विचार किसी दल या व्यक्ति से आगे बढ़कर एक प्रश्न बन जाता है—
क्या एक बेहतर समाज की नींव प्रेम, सहयोग और संवाद पर रखी जा सकती है?
मैं यह पोस्ट किसी राजनीतिक समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि विचार-विमर्श के उद्देश्य से साझा कर रही हूँ।
आपकी दृष्टि में "इश्क" का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या समाज में बढ़ता सहयोग और मानवीय संवेदना भी उसी का विस्तार है?
💭अपने विचार अवश्य साझा करें।




