Search This Blog

Search This Blog

Translate

Wednesday, July 22, 2026

क्या आज का सहयोग भी 'इश्क' का ही एक रूप है?

हाल ही में कपिल सिब्बल जी और जस्टिस मार्कंडेय काटजू जी के बीच हुई बातचीत में "इश्क करो पार्टी" का विचार सुनने को मिला।



मैं इसे किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक मानवीय विचार के रूप में देखती हूँ।

पिछले कुछ समय से देश में अनेक घटनाओं के दौरान हमने देखा है कि अलग-अलग जातियों, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं के लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हुए, एक-दूसरे की मदद की, अपनी आवाज़ मिलाई और कठिन समय में सहयोग दिया।

क्या यह भी "इश्क" का ही एक रूप नहीं है?

यदि इश्क का अर्थ केवल व्यक्तिगत प्रेम होकर मानवता, संवेदना, सहयोग, सम्मान और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होना है, तो शायद हम सब किसी किसी रूप में इस "इश्क" को जीते ही हैं।

यह विचार किसी दल या व्यक्ति से आगे बढ़कर एक प्रश्न बन जाता है

क्या एक बेहतर समाज की नींव प्रेम, सहयोग और संवाद पर रखी जा सकती है?

मैं यह पोस्ट किसी राजनीतिक समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि विचार-विमर्श के उद्देश्य से साझा कर रही हूँ।

आपकी दृष्टि में "इश्क" का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या समाज में बढ़ता सहयोग और मानवीय संवेदना भी उसी का विस्तार है?

💭अपने विचार अवश्य साझा करें।


Wednesday, July 8, 2026

Wednesday, June 24, 2026

Koisas da Minha Casa...e não só!!!: Uma falha na minha rica travessa...

Koisas da Minha Casa...e não só!!!: Uma falha na minha rica travessa...: ... e bem grande. Ficou tudo tão partidinho que nem deu para colar. Mas eu gosto tanto dela e quase nunca uso. É uma peça pintada à mão e ...

Sunday, March 1, 2026

बे ऑफ फायर्स: पत्थरों पर लिपटी 'कुदरती आग' का रहस्य

इसे देख कर चौंकिए मत, ये लाल चट्टाने नहीं। .... यह स्थान बे ऑफ फायर्स (Bay of Fires) है, जो ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया के पूर्वोत्तर तट पर स्थित एक बेहद खूबसूरत और प्रसिद्ध क्षेत्र है।
इसे देख कर चौंकिए मत, ये लाल चट्टाने नहीं। .... यह स्थान बे ऑफ फायर्स (Bay of Fires) है, जो ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया के पूर्वोत्तर तट पर स्थित एक बेहद खूबसूरत और प्रसिद्ध क्षेत्र है। यहाँ के पत्थरों पर दिखने वाला यह गहरा नारंगी-लाल रंग वास्तव में कोई पेंट या आग नहीं है, बल्कि लाइकेन (Lichen) नामक एक जीवित जीव है जो इन ग्रेनाइट की चट्टानों पर उगता है। इस जगह को 1773 में कैप्टन टोबियास फर्नोक्स ने 'बे ऑफ फायर्स' नाम दिया था, क्योंकि उन्होंने तट पर आदिवासियों द्वारा जलाई गई कई आग देखी थीं. अपनी सफेद रेत, कांच जैसे साफ नीले पानी और इन अनोखी लाल चट्टानों के मेल के कारण यह दुनिया के सबसे खूबसूरत समुद्र तटों में से एक माना जाता है। xoxo

Tuesday, September 9, 2025

चिरमिरी : दादी की डिबिया से गूगल तक की यात्रा — एक ललित संस्मरण


कुछ स्मृतियाँ जीवन में बिना किसी दस्तक के लौट आती हैं। वे किसी बड़े उत्सव या विशेष अवसर की प्रतीक्षा नहीं करतीं। कभी रसोई की किसी परिचित सुगंध से, कभी किसी पुराने गीत से और कभी आँख में पड़े एक छोटे-से तिनके से भी वे वर्षों पुरानी दुनिया का द्वार खोल देती हैं।

कुछ दिन पहले मेरी आँख में कोई बारीक-सा कण चला गया। बहुत देर तक उसे निकालने की कोशिश करती रही। आँख से पानी बहता रहा और हल्की-सी जलन बनी रही। तभी माँ का पुराना घरेलू उपाय याद आया—"जिस आँख में तिनका गया हो, उसे मत मलो। दूसरी आँख को धीरे-धीरे मलो, तिनका अपने-आप निकल आएगा।"

आज विज्ञान के युग में यह सलाह सुनने में भले ही साधारण लगे, पर उस समय घर-घर में ऐसे ही अनुभवजन्य ज्ञान ने छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान किया था। माँ की बात याद आई, तिनका भी निकल गया; लेकिन उसके साथ ही स्मृतियों का एक और तिनका मन में अटक गयाचिरमिरी।

चिरमिरी Source:wiki


यह शब्द वर्षों से मेरी स्मृतियों की तहों में कहीं दबा पड़ा था। शायद दशकों से मैंने इसे सुना था, बोला था। पर उस दिन अचानक जैसे किसी ने मन की पुरानी संदूकची खोल दी हो।

मुझे अपनी दादी याद गईं।

दादी के पास एक छोटी-सी डिबिया रहती थी। वह कोई कीमती धातु की नहीं थी, फिर भी मेरे लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी। उस डिबिया में रखे रहते थे लाल-लाल, चमकीले, चिकने दाने। हर दाने के एक सिरे पर काले रंग की छोटी-सी बिंदी बनी होती थी, मानो किसी ने बहुत बारीकी से उसे रंग दिया हो।

मैं देर तक उन्हें हथेली पर फैलाकर निहारा करती। बचपन की आँखों को वे किसी रत्न से कम नहीं लगते थे। मुझे लगता, जैसे दादी ने सचमुच छोटे-छोटे लाल मोती सँभालकर रख छोड़े हों।

दादी मुस्कराकर कहतीं—"इन्हें चिरमिरी कहते हैं।"

तब मैंने यह पूछा कि चिरमिरी क्या होती है, यह जानने की उत्सुकता हुई कि वे कहाँ से आती हैं। बच्चों के लिए वस्तुओं का रहस्य जानना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना उनके रंग, आकार और उनसे जुड़ी कल्पनाएँ।

आज सोचती हूँ, उस पीढ़ी के पास कितनी बातें थीं जिन्हें वे सहज ही जीते थे। उन्हें वनस्पति विज्ञान का ज्ञान नहीं था, पर वे पौधों को उनके स्वभाव से पहचानते थे। उन्हें इंटरनेट नहीं आता था, पर ऋतुओं के बदलने से पहले ही बता देते थे कि किस खेत में कौन-सी बेल उगेगी, किस झाड़ी पर कौन-सा फूल खिलेगा और किस पौधे से दूरी बनाए रखना चाहिए।

समय बदला। गाँव बदले। खेतों की बनावट बदली। बच्चों के खेल बदल गए। हमारी स्मृतियों के अनेक शब्द भी धीरे-धीरे जीवन से विदा लेते गए।

चिरमिरी भी उन्हीं शब्दों में से एक थी।

बरसों बाद जब उसका नाम याद आया तो मन ने जैसे अपने-आप खोज शुरू कर दी। अब दादी नहीं थीं, उनसे पूछना संभव नहीं था। इसलिए मैंने वही किया जो आज की पीढ़ी करती हैमोबाइल उठाया और इंटरनेट पर खोजने लगी।

स्क्रीन पर जो नाम उभरा, वह मेरे लिए बिल्कुल नया थाAbrus precatorius

क्षणभर के लिए लगा जैसे दादी की छोटी-सी डिबिया और आधुनिक विज्ञान एक ही मेज़ पर आकर बैठ गए हों। एक ओर स्मृतियों की गर्माहट थी, दूसरी ओर वनस्पति विज्ञान की ठंडी, व्यवस्थित जानकारी।

मुझे लगा, इन दोनों के बीच की यात्रा ही शायद हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी कहानी है।

 

दादी की डिबिया और लोकज्ञान का पहला विद्यालय

दादी के पास कोई बड़ी अलमारी नहीं थी। उनके पास कुछ लोहे के संदूक थे, एक पीतल की लोटिया, सिलाई का छोटा-सा डिब्बा और एक नन्ही-सी डिबिया, जिसे वे बड़े जतन से संभालकर रखती थीं। उस समय मुझे कभी समझ नहीं आया कि उस छोटी-सी डिबिया में ऐसा क्या है, जिसे वे बार-बार खोलतीं, फिर उतनी ही सावधानी से बंद कर देतीं।

एक दिन उनकी हथेली पर वे लाल-लाल दाने बिखरे हुए थे।

मैंने उत्सुकता से पूछा भी नहीं। बच्चों के प्रश्न अक्सर शब्दों से नहीं, आँखों से पूछे जाते हैं। मेरी आँखों की चमक देखकर दादी मुस्करा दीं। उन्होंने मेरी हथेली आगे कर दी और दो-तीन दाने उस पर रख दिए।

वे कितने सुंदर थे!

गाढ़ा लाल रंग, जैसे किसी ने सिंदूर में डुबो दिया हो, और एक सिरे पर काला-सा निशान। इतने चिकने कि हथेली पर धीरे-धीरे फिसलने लगते। मुझे वे किसी राजकुमारी के हार से टूटकर गिरे लाल मोती लगते थे।

दादी ने कहा—"इन्हें चिरमिरी कहते हैं।"

बस, इतना ही।

उन्होंने उसका वानस्पतिक नाम बताया, उसके गुण, दोष। उस समय इसकी आवश्यकता भी कहाँ थी! बच्चों को ज्ञान नहीं, अपनापन दिया जाता था। वस्तुओं का परिचय पुस्तकों से नहीं, स्पर्श से होता था।

आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे घरों की बुज़ुर्ग स्त्रियाँ सचमुच चलते-फिरते ज्ञानकोश थीं। उन्होंने शायद किसी विश्वविद्यालय का मुँह नहीं देखा था, पर मिट्टी की भाषा पढ़ना जानती थीं। उन्हें यह बताने के लिए किसी मोबाइल की आवश्यकता नहीं पड़ती थी कि किस मौसम में कौन-सी बेल निकलेगी, कौन-सा पौधा औषधि है, किस झाड़ी से दूरी रखनी चाहिए और कौन-सा बीज केवल देखने भर के लिए सुंदर है।

उनका ज्ञान पुस्तकों में नहीं, अनुभव में लिखा था।

गाँव का जीवन भी तब प्रकृति के साथ साँस लेता था। बरसात आते ही सूखी धरती का रंग बदल जाता। टिब्बों पर नई घास उग आती। खेतों की मेड़ों पर बेलें फैल जातीं। बच्चे स्कूल से लौटते हुए हर नई चीज़ को कौतूहल से देखते। किसी को पौधे का वैज्ञानिक नाम नहीं मालूम होता था, फिर भी सब उसे उसके अपने लोकनाम से पहचान लेते थे।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि हमने केवल कुछ पौधे ही नहीं खोए हैं; हमने उनके नाम भी खो दिए हैं। "चिरमिरी" जैसा शब्द अब शायद ही किसी बच्चे की शब्दावली में मिलेगा। उसकी जगह इंटरनेट पर लिखा हुआ Abrus precatorius मिल जाएगा, पर उस नाम में दादी की मुस्कान कहाँ मिलेगी?

ज्ञान बढ़ा है, इसमें कोई संदेह नहीं। पर क्या स्मृतियाँ भी उतनी ही समृद्ध हुई हैं?

यही प्रश्न मुझे बार-बार भीतर तक छू जाता है।

मेरी पीढ़ी शायद उन अंतिम पीढ़ियों में है, जिसने एक साथ दो संसार देखे हैंएक वह, जहाँ दादी की डिबिया किसी विश्वकोश से कम नहीं थी; और दूसरा यह, जहाँ उत्तर खोजने के लिए हम सबसे पहले मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ फेरते हैं।

इन दोनों संसारों के बीच खड़ी मैं सोचती हूँक्या आने वाली पीढ़ियाँ कभी समझ पाएँगी कि किसी छोटे-से लाल बीज में भी पूरा बचपन सुरक्षित रह सकता है?

 

हम केवल पौधे नहीं खो रहे...

आज जब मोबाइल की स्क्रीन पर Abrus precatorius लिखा दिखाई देता है, तो मुझे उससे पहले दादी की आवाज़ सुनाई देती है—"बिटिया, ये चिरमिरी है।"

विज्ञान ने मुझे उसका वानस्पतिक नाम बता दिया, उसके गुण-दोष समझा दिए, उसके विषैले होने की चेतावनी भी दे दी। लेकिन वह स्पर्श, वह अपनापन और वह आत्मीयता नहीं दे सका, जो दादी की हथेली से मेरी हथेली तक पहुँची थी।

मैं सोचती हूँ, किसी पौधे की सबसे पहली पहचान उसका वैज्ञानिक नाम नहीं होती। उसकी पहली पहचान होती हैउससे जुड़ी स्मृति।

किसी के लिए वह खेत की मेड़ है, किसी के लिए दादी की डिबिया, किसी के लिए बचपन का खेल और किसी के लिए घर की मिट्टी की महक।

समय के साथ बहुत कुछ बदलना स्वाभाविक है। बदलती खेती, बदलते गाँव, बदलती जीवनशैली और बदलती पीढ़ियाँइन सबको रोका नहीं जा सकता। पर स्मृतियों का लुप्त हो जाना नियति नहीं होना चाहिए।

आज के बच्चे शायद चिरमिरी को उसके अंग्रेज़ी नाम से खोज लें, उसकी तस्वीर भी देख लें, उसके बारे में पूरा लेख पढ़ लें; लेकिन यदि वे अपनी दादी या नानी से उसके बारे में एक भी कहानी नहीं सुन पाए, तो उनका ज्ञान अधूरा ही रहेगा।

क्योंकि ज्ञान केवल पुस्तकों और इंटरनेट से नहीं बनता; वह पीढ़ियों के अनुभव, लोकविश्वास, बोली, स्पर्श और आत्मीय संवाद से भी बनता है।

हमारी दादियाँ और नानियाँ विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ीं, फिर भी वे प्रकृति की ऐसी अध्यापिकाएँ थीं, जिनकी कोई डिग्री नहीं थी, पर जिनका ज्ञान जीवन भर साथ चलता था। उन्होंने हमें पौधों के नाम ही नहीं दिए, उन्होंने हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाया।

आज जब मैं अपने बचपन की ओर देखती हूँ, तो लगता है कि चिरमिरी केवल एक लाल बीज नहीं है। वह मेरे गाँव का एक शब्द है, मेरी दादी की मुस्कान है, मेरी माँ की सीख है और उस पूरे लोकजीवन की स्मृति है, जिसे धीरे-धीरे हम अपनी आँखों के सामने धुँधला होते देख रहे हैं।

शायद इसलिए आज सबसे अधिक चिंता इस बात की नहीं है कि चिरमिरी की बेलें कम हो रही हैं।

चिंता इस बात की है कि उन्हें पहचानने वाली आँखें कम होती जा रही हैं।

हम केवल पौधे नहीं खो रहे,
हम केवल उनके लोकनाम नहीं खो रहे,
हम केवल खेतों की हरियाली नहीं खो रहे

हम अपनी भाषा खो रहे हैं।
हम अपनी स्मृतियाँ खो रहे हैं।
हम अपनी दादियों की आवाज़ खो रहे हैं।
और इनके साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का वह अनमोल हिस्सा भी, जिसे कोई पुस्तक, कोई इंटरनेट और कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूरी तरह वापस नहीं ला सकती।

यदि यह लेख पढ़ते समय आपको भी अपने गाँव का कोई पौधा, कोई बीज, कोई पेड़, कोई लोकनाम या किसी बुज़ुर्ग की कोई बात याद गई हो, तो समझिए कि चिरमिरी आज भी जीवित है। वह केवल खेतों में नहीं, हमारी स्मृतियों में भी अंकुरित होती रहती है।

शायद स्मृतियाँ भी बीज ही होती हैं।
उन्हें बस प्रेम की थोड़ी-सी मिट्टी और यादों की हल्की-सी वर्षा चाहिएफिर वे पीढ़ियों तक हरी रहती हैं।

"सभ्यताएँ तब नहीं मिटतीं जब उनके जंगल उजड़ते हैं; वे तब मिटने लगती हैं जब उनके बच्चों को अपनी दादी की बोली में किसी पौधे का नाम याद नहीं रहता।"



My inspirational blog today:
last day of may: 24/52: ...