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Wednesday, August 5, 2026

कॉकरोच' के इंक़लाब से हसरत मोहानी की विरासत तक: युवाओं की ज़िद और हुक़ूमत का सच


पिछले दिनों जंतर-मंतर पर एक अजीब, व्यंग्यात्मक लेकिन बेहद ताक़तवर मंज़र देखने को मिला। जब देश के युवाओं को व्यवस्था की कमियों और पेपर लीक जैसी धांधलियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर 'कीड़े-मकोड़े' समझा गया, तो उन्होंने उसी तंज़ को अपना हथियार बना लिया। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के झंडे तले जब देश के हज़ारों नौजवानों ने सड़कों पर उतरकर "इंक़लाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाए, तो सत्ता के गलियारे हिल उठे। लेकिन क्या हम जानते हैं कि इस ऐतिहासिक नारे के पीछे का इतिहास और रूह क्या है?

'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का जन्म और इतिहास

आज जब भी कोई छात्र आंदोलन या नागरिक प्रदर्शन होता है, तो 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' की गूँज हवाओं में तैरने लगती है। आम तौर पर लोग इस नारे का श्रेय शहीद--आज़म भगत सिंह को देते हैं, लेकिन ऐतिहासिक सच यह है कि इस नारे को सबसे पहले साल 1921 में मौलाना हसरत मोहानी ने गढ़ा और लिखा था।

हसरत मोहानी एक महान स्वतंत्रता सेनानी, सूफ़ी मिज़ाज शख्शियत और क्रांतिकारी शायर थे। उन्होंने यह नारा किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उस समय अंग्रेज़ी हुक़ूमत की तानाशाही के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे भारतीय युवाओं में एक नई ऊर्जा और चेतना फूँकने के लिए दिया था। बाद में भगत सिंह और उनके साथियों ने जब असेंबली में बम फेंका, तो इस नारे को बुलंद कर इसे देश के बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर पहुँचा दिया।

आज की परिस्थिति में इसकी प्रासंगिकता (Relevance)

आज दशकों बाद भी इस नारे की प्रासंगिकता रत्ती भर कम नहीं हुई है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' के बैनर तले जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह यह साबित करता है कि जब भी युवाओं के भविष्य, उनकी शिक्षा और उनके अधिकारों पर चोट की जाएगी, तब-तब यह नारा पुनर्जीवित होगा।

यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि देश के 'बर्न-आउट' हो चुके युवाओं की वह हताशा और ग़ुस्सा है, जो शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीक़े से जवाबदेही की माँग करता है। चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सड़क पर उतरकर युवाओं की उम्मीदों का जवाब देना ही असली लोकतंत्र है।

हुक़ूमत की सख़्तियाँ और वतन की मोहब्बत

हसरत मोहानी ने आज से 100 साल पहले जेल में रहते हुए या आंदोलनों के दौरान जो कुछ महसूस किया था, उसे अपनी ग़ज़ल के इस शेर में पिरो दिया था। यह शेर आज के माहौल पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है:

"अच्छा है अहल--जौर (अत्याचारी) किए जाएँ सख़्तियाँ,
फैलेगी यूँ ही शोरिश--हुब्ब--वतन (देशभक्ति की लहर) तमाम।"

यह शेर साफ़ तौर पर इशारा करता है कि हुक़ूमत चाहे जितनी सख़्तियाँ कर ले, मुक़दमे दर्ज कर ले या आवाज़ों को दबाने की कोशिश करेइतिहास गवाह है कि दमन से आंदोलन ख़त्म नहीं होते, बल्कि वतन की मोहब्बत और अन्याय के ख़िलाफ़ आक्रोश की लहर और तेज़ी से फैलती है। जब-जब सत्ता अपनी ताक़त का ग़ुरूर दिखाएगी, तब-तब देश का युवा इसी तरह शांतिपूर्ण और रूहानी अंदाज़ में 'इंक़लाब' का परचम बुलंद करता रहेगा।




XO

Wednesday, July 22, 2026

क्या आज का सहयोग भी 'इश्क' का ही एक रूप है?

हाल ही में कपिल सिब्बल जी और जस्टिस मार्कंडेय काटजू जी के बीच हुई बातचीत में "इश्क करो पार्टी" का विचार सुनने को मिला।



मैं इसे किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि एक मानवीय विचार के रूप में देखती हूँ।

पिछले कुछ समय से देश में अनेक घटनाओं के दौरान हमने देखा है कि अलग-अलग जातियों, धर्मों, भाषाओं और विचारधाराओं के लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हुए, एक-दूसरे की मदद की, अपनी आवाज़ मिलाई और कठिन समय में सहयोग दिया।

क्या यह भी "इश्क" का ही एक रूप नहीं है?

यदि इश्क का अर्थ केवल व्यक्तिगत प्रेम होकर मानवता, संवेदना, सहयोग, सम्मान और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होना है, तो शायद हम सब किसी किसी रूप में इस "इश्क" को जीते ही हैं।

यह विचार किसी दल या व्यक्ति से आगे बढ़कर एक प्रश्न बन जाता है

क्या एक बेहतर समाज की नींव प्रेम, सहयोग और संवाद पर रखी जा सकती है?

मैं यह पोस्ट किसी राजनीतिक समर्थन या विरोध के लिए नहीं, बल्कि विचार-विमर्श के उद्देश्य से साझा कर रही हूँ।

आपकी दृष्टि में "इश्क" का वास्तविक अर्थ क्या है?
क्या समाज में बढ़ता सहयोग और मानवीय संवेदना भी उसी का विस्तार है?

💭अपने विचार अवश्य साझा करें।