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Saturday, September 25, 2010

एक फ़ूल एक फूलदान!

जी हाँ!... आप एक फूलदान में एक फ़ूल से भी सुन्दर सजावट कर सकती हैं!।
आवश्यकता है ...तो बस सूझ-बूझ की।
कई सारी एक ही रंग की बोतलें जमा कीजिये... एक फ़ूल और ढेर सारी पत्तियों का गुच्छा ...और लगा दीजिये इन बोतलों में ....

रसोई घर के कोने को कैसा खिला दिया है इन्होने ......

और यह देखिये बाथरूम के सामने .......

सुबह ७ बजे ज़ब में सैर करके लौट रही थी मेरी भतीजी कैमरा लेकर कड़ी थी।
बुआजी देखो फ़ूल ...और हमने इस सुबह की अलमस्त बेला में सूर्य देवता के आगमन से पहले ही ढेर सारी फोटो कैद कर ली.


मेरे घर के सामने के पार्क में यह पीले फूलों वाला झाड जिसे ज़्यादा पानी, रखवाली की जरूरत नहीं होती ....अपनी छटा बिखेरता रहता है... सुबह से ही पूजा के लिए इसके फूलों को तोड़ने की जैसे होड़ सी लग जाती है..यह जहरीला पौधा है...
पर फ़ूल तो फ़ूल हैं ना......


मैने यह पर्स सालों पहले (१९९५) बनाया था, मेरा बहुत पसंदीदा सूट प्रेस से जल गया था,उसका उपयोग करते हुए मैने एक बड़ा बैग जो की मैने गिफ्ट कर दिया था (याद नहीं किसे) पर यह मेरे पास है । इसे मैने खूब इस्तेमाल किया फ़िर बोक्स के किसी कोने में रख दिया ...
एक दिन यह मेरे हाथ लगा और फ़िर से मेरे साथ इसने घूमना शुरू कर दिया।
मेरे कार्बन-फ़ुट-प्रिंट कैसे हैं ?
Isn’t it sustainable lifestyle!




Wednesday, September 1, 2010

A feminist revolution .....

Indian feminism is the feminism of compromise। It is the feminism of daughters who press their parents for late curfews, but would never hurt them by dating a man of another religion. It is the feminism of women who collect big paychecks by day, but do not question husbands who treat them like maids by night. It is the feminism of women who cope privately with workplace harassment, but never see it as a systemic phenomenon to be fought.
more......

http://www.nytimes.com/2008/09/25/world/asia/25iht-letter.1.16472456.html

Monday, August 30, 2010

Yes it’s me

Me .......and Me .....
and Me Me

Me

Me


and Me
Now…॥ a poem of my cute daughter …..

Yes in this life

Meeting with you
in life
is like meeting hands
with the sky

Departure with you
means broken relations
with the
mother earth


May I libérate the
sky to make
full mockery
or shirk my hands
to toil in the soil

May I spread seeds on
dream land of mine
which is smeared
with fine algae
and wait for a long

May I throw life
that I lived
like squeezed lime
or preserve it like
Precious stone

May I tell speechless tale
to the time that come

How many decisions
can I take
in this life
only


---विपिन chaudhary

Tuesday, August 24, 2010

गुलगुले (मीठे पकोड़े)

चीनी और गेहूं के आटे के मीठे पकोड़े
हरियाणा में तीज पर सुहाली, गुलगुले बनाना परम्परा का हिस्सा है.....

सामग्री:
गेहूं का आटा (आटा) - 250 ग्राम
गुड - 100 ग्राम
पानी 1 कप
सौंफ़ (Saunf) - 1 / 2 tsp
तेल - तलने के लिए
दही / दही - 2 त्स्प\


बनाने का तरीका:

  • एक कटोरी पानी में गुड मिक्स करें और रात भर के लिए रख दें , ताकि सुबह तक यह पिघल जाएँ।
  • अब गेहूं का आटा और गुड का पानी अच्छी तरह मिक्स करें ।
  • 5 मिनट के लिए मिश्रण को मिक्स करें ताकि, गुलगुले फुले हुए और नरम बनें।
  • एक घंटे के लिए खमीर विकसित करने के लिए अलग रखें।
  • एक पैन में तेल गर्म करें . मिश्रण में सौंफ अच्छी तरह मिलाएं . तैयार मिश्रण का १-१ चम्मच गर्म तेल में डालती जाएँ और एक मिनट बाद पलटें, दोनों तरफ से सुनहरा भूरे रंग होने तक तलें। आप गुलगुले देसी घी में भी तल सकते हैं.

गर्म -गर्म परोसें यह बहुत स्वादिष्ट लगते हैं.

Tuesday, August 3, 2010

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ

हंस की सालाना गोष्ठी ३१ जुलाई को दिल्ली में हुई हंस हिंदी की पत्रिका मुंशी प्रेमचंद जी १९३० से किकालते थे जो बाद में क्न्हीं कारणों से बंद कर दी गई थी . इसे बाद में राजेन्द्र यादव जी ने बाद में फिर से निकालना शुरू किया हंस की गोष्ठी में हंगामा इस बार हंगामा हुआ एस पर मेरी बेटी की प्रतिक्रिया पढ़ें

Vipin Choudhary http://www.janjwar.com/

जनज्वार

www.janjwar.com


मेने मुंशी प्रेमचंद की अधिकतर कहानियाँ पढ़ी हैं आप भी इन्हें पढिये. आज के परिपेक्ष में भी ये तर्कसंगत हैं ..इन्हें यहाँ पढ़ें ..

Munshi Premchand Ki Kahaniya.

Sunday, July 11, 2010

हरियाणा के गावों में तीज....

हरियाणा के गावों में तीज का त्यौहार कुछ अलग ही समां बांधता है,
दिन में तालाब किनारे बड़े-बड़े पेड़ों पर रस्से बाँध कर औरतें गीत गाती हैं
श्याम को गावं में महिलाएं चरखा गाते हुए गीत गाती हैं.


तीज का गीत

झूलण जांगी हे मां मेरी बाग मैं री ...
आये रही कोए संग-सहेली चार ...
झूलण जांगी हे मां मेरी बाग मैं री ...
कोए 15 की मां मेरी, कोए 20 की री ...
आये रही कोए संग-सहेली चार ... झूलण
कोए गोरी हे मां कोए सांवऴी ...
आये रही कोए ...

तीजां का त्योहार रितु सामण की ...
खडी झूल पै मटकै छोरी बामण की ...
क्यों तूं ऊंची पिंग चढावै ...
क्यों पड कै नाड तुडावै ...
या लरज-लरज करै डाह्ऴी जामण की ...
तीजां का .....


तीज का एक और गीत

हां.... चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
होर छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...
चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...

मार चौखडी ... हुं ... मार चौखडी ...
चढी पींघ पै ... लत्ते-चाऴ सजा कै ...
दो छोरियां ने लसकर पकड्या ...इधर-उधर तै आकै ...
न्यून घुमाई-न्यून घुमाई ...मारी पींघ बधा कै ...
सासू जी का नाक तोड ल्याई ... लाम्बा हाथ लफ्फा कै ...
झौटा फिरग्या ... खिली बत्तीसी, झौटा फिरग्या ... खिली बत्तीसी ...
कहै बीर सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...
चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...

तेज हवा मैं पल्ला उड्ग्या ... होस रहया ना गाती का ...
झटका लाग्या ... नाथ टूटगी .. ग़या लिकड पेच पाती का ...
कोडी होके ठावण लागी ... हार झुक्या छाती का ...
उह्का बोलण नै जी कर रहया था ... मुह पाटया ना सरमाती का ...
पल्ला ठा मुह पूछण लागी ... होएए ...पल्ला ठा मुह पूछण लागी
गई कली दीख दामण की ....
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...
चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...

ऊची एडियां के बूट पहर रही ... कडी तोडिये भारी ...
हरे रंग का कमीज पहर रही ... काऴी-पीऴी धारी ...
चम्पाकली हवेल झालरा ... टिक्की तक भी ला रही ...
52 गज का घूम-घाघरा ऊठी कलियां न्यारी-न्यारी ...
दरजी के न छांट करी सै ..दरजी के न छांट करी सै ..
भाई मगजी और लामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...
चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...

जिब आवे सामण का महीना ... गोरी रंग नै छाटैं ...
किसे की गोरी किसे की छोरी .. सबके सत्ते छाटैं ...
किसे की कोथऴी किसे का सींधारा ... भर भर बुगटे बांटै ...
20 साल तै नीचै-नीचै ... खुरियां धरती काटैं ..
बेरा ना कित तीज मनैगी .. बेरा ना कित तीज मनैगी ..
उस लखमीचंद बामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...
चौगरदे तै बाग हरया ... घनघोर घटा सामण की ...
छोरी गावें गीत सुरीले ... झूल घली सामण की ...


अगली बार में तीज पर बनाने वाले कुछ ख़ास पकवानों के बारे में जरुर लिखूँगी
सबको आने वाली तीज मुबारक हो !

Monday, May 24, 2010

Flavours of culture, my jatropa, inspiration



Inspiration

Flavours of culture






marigold dominates here jatropa flowers are small ones.

A big salute to my Jatropa tree for it stood the cold weather for me and producing these cheerful red flowers non-stopping the whole winter

xoxo